Thursday, 17 December 2015

sidhiyan: हास्टल की लाइफ बहुत ही फ्री थी, लेकिन वैसी नही हमा...

sidhiyan: हास्टल की लाइफ बहुत ही फ्री थी, लेकिन वैसी नही हमा...: हास्टल की लाइफ बहुत ही फ्री थी, लेकिन वैसी नही हमारी वॉर्डन बहुत सख्त थी, हम रोज धर्मपथ घूमने जाते, एक साँझ वॉर्डन मम ने हम सबको उप्र के गै...
हास्टल की लाइफ बहुत ही फ्री थी, लेकिन वैसी नही हमारी वॉर्डन बहुत सख्त थी, हम रोज धर्मपथ घूमने जाते, एक साँझ वॉर्डन मम ने हम सबको उप्र के गैलरी में पकड़ा, मेरी साड़ी सहेलियां तेजी से भाग गयी , और मई बोडम रह गयी, मम के सामने भीगी बिल्ली बनी, जैसे बचपन में गोपिका मेम ने मेरे हाथों पर छड़ियां बरसाई थी, और डरकर मेरे कपड़े भीग गए थे, क्लास में ही, जबकि पढ़ाई में सबसे आगे, लेकिन मेडम से बहुत डर्टी थी, यूँ कहो, बेहद शर्मीला नेचर थे मेरा ,
तो, उस शाम भुस्कुटे मेडम ने मुझे खूब लेक्चर झाड़ा और मई चुप सुनती रही, फिर मई उतनी शाम घूमने नही गयी, लेकिन जब मेरा सीनियर मिलने पहुंचा तो, मई इतने तेजी से मिलने निचे भागी की, उप्र आ रही, दो सखियों से टकरा गयी, मई दरअसल माधुरी से कटरा गयी, बेचारी दुबली पतली सलीम लड़की, मेरे जैसी उस वक़्त की मोती मोटी की टक्क्र से गिरी नही, क्यूंकि, मई वाकई बहुत तेज भागी थी, और टकराई भी वंहा जन्हा सीढियाँ टर्न होती है , वो तो, बेचारी भौंचक्क रह गयी, और मई सॉरी कहकर निचे गयी, इधर माधुरी ने उप्र से झांक कर निचे देखा तो, दूसरा सॉक , वो उसीका रिलेटिव था, फिर तो, ओ कभी हॉस्टल नही आ सका , और हमारी मित्रता चली लेकिन ब्रेक तो लग ही गया , बहुत मुश्किल होता है, मेरे घर में नही पता , क्या समझा गया, की मेरा विवाह, फर्स्ट ईयर के बाद ही हो गया, जबकि मैंने शादी के बाद भी अपनी लॉ की स्टडी कम्पलीट की , राजू तुम बहुत जाहीं थे, आज भी उन बातों पर हँसते तो, होंगे 

Tuesday, 15 December 2015

  मेरे हास्टल की सीढियाँ थी वे टर्न होती, साँझ के धुंधलके में घिरी 
आज भी जिंदगी उतने ही धुंधली लगती है 
पर, मई ईश्वर पर यकीन करती हूँ रोज उसका नाम लेकर उठती हूँ 

Monday, 31 August 2015

देश को जरुरत है ग्रंथालयों की 
किन्तु , जो सरकारी लाइब्रेरी है 
उनसे सरकारी प्रशाशन उदासीन है 
यंहा  तक कि जनता भी सुध नही ले रही 
तो, जो चिंतको  व् साहित्यकारों ने लिखा है 
उसे कौन पढ़ेगा , कोई नही चाहता ,
किताबें पढ़ना 

Sunday, 5 July 2015

हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी सबसे अलग है 
वे सबके पत्रों का जवाब देते है 
यदि आपको कंही कोई शिकायत है , तो 
लिखे 
प्रधान मंत्री कार्यालय 
नई देल्ही -११०००१ 
आपके पत्र को सही विभाग में भेजा जायेगा 
जन्हा एक ओर ख़ुशी है 
वंही दूसरी ओर उदाशि भी 
कि मेरी ११ वी किताब आने वाली है 
किन्तु , प्रकाशक बीमार है 
और, मई जब प्रकाशक की आवाज फोन पर सुनती हूँ 
तो, मुझे महसूस होता है कि 
वे वाकई कमजोर हो गए है 
बढ़ती उम्र में ये कमजोरी सभी को होती है 
मई अपने प्रकाशक के ठीक होने की कामना करती हूँ 

Tuesday, 30 June 2015

Oh Re Taal Mile - Sanjeev Kumar - Anokhi Raat - Bollywood Songs - Mukesh

वादा करती हूँ 
अपनों से कुछ नही छुपाऊँगी 
एक दिन सब कुछ बता दूंगी 
जब, मई जीत जाउंगी 
सच....... 
जीत जायेंगे जिंदगी की जंग 

Saturday, 27 June 2015

Kora Kagaz Tha Yeh Man Mera - Aradhana - Kishore Kumar & Lata Mangeshkar...

आज महादेवी के संस्मरण पढ़े 
उस जमाने में भी उन्हें जो हासिल था 
वो, तो, हमे आज भी नही मिला 
फिर भी लिखना अच्छा लगता है 
ऐसा लगता है 
कागज पर उकेरे शब्द हमेशा मेरे साथ होते है 
सब मुझे नही समझ सकते 
किन्तु, शब्दों की साधना ने 
दिल के दर्द और 
अकेलेपन को समझा है 
इश्लीए 
इसे मई एक साधना और 
साथी दोनों मानती हूँ 
और, किसी से भी कह सकती हूँ 
की, जब दुनिया में कोई आपकी दिल की बात न सुने 
तब, आप कागज से 
दिल का हाल जरूर कहिये 
ये, आपको , सुकून देगा 
लिखने की शुरुआत भी इन्ही से होती है 
किन्तु, कोई न, छपे तो 
हताश नही होना 
आजकल, साहित्य नही छपता 
पत्रिकाओं में पहचान जरुरी होती है 
फिर भी 
लिखना एक सुकून भरा अहसास होता है बहुत बार तो 
हम, जाने कितना कुछ 
कागजों में समेत लेते है 
                                 जोगेश्वरी सधीर           

Thursday, 25 June 2015

m
अरे संध्या 
तुम भी 
मई इधर थोड़ी व्यस्त थी 
घर के कामों में 
नही आ सकी 
आप ऐसा नही सोचें 
कृष्ण की मुझे पर 
बहुत कृपा है 
वे मेरी रक्षा करते है 
मुझे कोई छू भी नही सकते 
सब, छू-मंत्र हो जाते है 
और , आप तो वैसे भी 
जेहन में याद आती रहती हो 
कहा कहा घूमती रही कभी 
कोई हाथ भी नही लगा सका 
क्यूंकि , ईश्वर ने सुरक्षा दी है 
मेरी ही नही, सभी की 

Thursday, 18 June 2015

मुझसे कहा गया 
तुमसे दुश्मनी नही है 
जो, इतनाबिल भेज दिए ये सरकार ने 
tc वालों पर 
चार्जेज  है 
हो, गयी न 
गरीब की थाली से चोरी 

Monday, 8 June 2015

प्रिय संध्या  
               writing was always dangerous for me 
                        y, u will ask, y
                   लिखना हमेशा बहुत मुश्किल था 
                  क्यूंकि, वंहा कोई भी मेरा godfather नही था  
                  फिर भी मई करती रही 
                  क्यूंकि, psc  में waiting में फेंक दिए जाने के बाद 
                   अपनी spoiled घरु जिंदगी में , मई बहुत अकेली 
                  बदहवास सी जी रही थी 
                       मायके वालों में कोई पूछता न था 
                         जो कुछ था , अपना लिख कर बयान था 
                                   अपने बेटे को कलेजे से लगाये जीना था      
                                  लिखती रही 
घर से  अलग भी हुई 
                               तो, फिरसे घर से मुझे पैसा मिला 
                              मुझे लिखने की अंधी chah  चाह ने कभी सर नही उठाने दिया 
                                    लिखकर, कागज रंग भर रही थी 
                                    दो बार मुंबई गयी 
                                  स्टॉक में अंधाधुन्द पैसा गंवाया 
                                        सब तरफ से बर्बादी झेली 
                                     और बताउंगी, क्ल…… 
                                 ये ठीक हुआ, की आप इस औघड़ दुनिया की गिरफ्त से 
                                          निकल गयी। …क्न्हि पहचान हो तो, लिखे 
                                       वरना अंधे कुएं में डालने से कोई मतलब नही। ....... 
                                 ynha ajkl
                                    आजकल, करपोरेट लेखन के युग में हमें कोई नही पूछने वाला वंहा 
                                 अब, लेखन जगत वैसा नही रहा 
ये संघर्ष जीवन भर  का है 
                                     किन्तु, एक लड़की  विवाह 
                                      और , उसका परिवार उसे सहारा देता है 
                                          ये सच है कि मैंने  दुःख झेले 
                                              किन्तु, मेरा घर ही मेरा आश्रय रहा 
                                                      मुझे वंही से आर्थिक सहारा रहा 
                                                        अंत में मई घर -परिवार की सेवा में हूँ 
                                                      ये मेरा सौभाग्य है 
                                                        क्यूंकि, बहुत  लिखने  बाद भी 
                                                       मई पारिवारिक -किस्म की ही रही 
                                                       फिर भी, मई इन्ही चाहूंगी 
कि , आज की लड़की , लेखन करे भी तो, कोई आर्थिक संबल मिला के करे 

Friday, 22 May 2015

आपकी जिंदगी आपके लिए कीमती है 
निराश नही होना चाहिए 
हमेशा प्रेयर करे 
अपने लिए