Tuesday, 30 June 2015
Saturday, 27 June 2015
आज महादेवी के संस्मरण पढ़े
उस जमाने में भी उन्हें जो हासिल था
वो, तो, हमे आज भी नही मिला
फिर भी लिखना अच्छा लगता है
ऐसा लगता है
कागज पर उकेरे शब्द हमेशा मेरे साथ होते है
सब मुझे नही समझ सकते
किन्तु, शब्दों की साधना ने
दिल के दर्द और
अकेलेपन को समझा है
इश्लीए
इसे मई एक साधना और
साथी दोनों मानती हूँ
और, किसी से भी कह सकती हूँ
की, जब दुनिया में कोई आपकी दिल की बात न सुने
तब, आप कागज से
दिल का हाल जरूर कहिये
ये, आपको , सुकून देगा
लिखने की शुरुआत भी इन्ही से होती है
किन्तु, कोई न, छपे तो
हताश नही होना
आजकल, साहित्य नही छपता
पत्रिकाओं में पहचान जरुरी होती है
फिर भी
लिखना एक सुकून भरा अहसास होता है बहुत बार तो
हम, जाने कितना कुछ
कागजों में समेत लेते है
जोगेश्वरी सधीर
उस जमाने में भी उन्हें जो हासिल था
वो, तो, हमे आज भी नही मिला
फिर भी लिखना अच्छा लगता है
ऐसा लगता है
कागज पर उकेरे शब्द हमेशा मेरे साथ होते है
सब मुझे नही समझ सकते
किन्तु, शब्दों की साधना ने
दिल के दर्द और
अकेलेपन को समझा है
इश्लीए
इसे मई एक साधना और
साथी दोनों मानती हूँ
और, किसी से भी कह सकती हूँ
की, जब दुनिया में कोई आपकी दिल की बात न सुने
तब, आप कागज से
दिल का हाल जरूर कहिये
ये, आपको , सुकून देगा
लिखने की शुरुआत भी इन्ही से होती है
किन्तु, कोई न, छपे तो
हताश नही होना
आजकल, साहित्य नही छपता
पत्रिकाओं में पहचान जरुरी होती है
फिर भी
लिखना एक सुकून भरा अहसास होता है बहुत बार तो
हम, जाने कितना कुछ
कागजों में समेत लेते है
जोगेश्वरी सधीर
Thursday, 25 June 2015
अरे संध्या
तुम भी
मई इधर थोड़ी व्यस्त थी
घर के कामों में
नही आ सकी
आप ऐसा नही सोचें
कृष्ण की मुझे पर
बहुत कृपा है
वे मेरी रक्षा करते है
मुझे कोई छू भी नही सकते
सब, छू-मंत्र हो जाते है
और , आप तो वैसे भी
जेहन में याद आती रहती हो
कहा कहा घूमती रही कभी
कोई हाथ भी नही लगा सका
क्यूंकि , ईश्वर ने सुरक्षा दी है
मेरी ही नही, सभी की
तुम भी
मई इधर थोड़ी व्यस्त थी
घर के कामों में
नही आ सकी
आप ऐसा नही सोचें
कृष्ण की मुझे पर
बहुत कृपा है
वे मेरी रक्षा करते है
मुझे कोई छू भी नही सकते
सब, छू-मंत्र हो जाते है
और , आप तो वैसे भी
जेहन में याद आती रहती हो
कहा कहा घूमती रही कभी
कोई हाथ भी नही लगा सका
क्यूंकि , ईश्वर ने सुरक्षा दी है
मेरी ही नही, सभी की
Thursday, 18 June 2015
Monday, 8 June 2015
प्रिय संध्या
writing was always dangerous for me
y, u will ask, y
लिखना हमेशा बहुत मुश्किल था
क्यूंकि, वंहा कोई भी मेरा godfather नही था
फिर भी मई करती रही
क्यूंकि, psc में waiting में फेंक दिए जाने के बाद
अपनी spoiled घरु जिंदगी में , मई बहुत अकेली
बदहवास सी जी रही थी
मायके वालों में कोई पूछता न था
जो कुछ था , अपना लिख कर बयान था
अपने बेटे को कलेजे से लगाये जीना था
लिखती रही
घर से अलग भी हुई
तो, फिरसे घर से मुझे पैसा मिला
मुझे लिखने की अंधी chah चाह ने कभी सर नही उठाने दिया
लिखकर, कागज रंग भर रही थी
दो बार मुंबई गयी
स्टॉक में अंधाधुन्द पैसा गंवाया
सब तरफ से बर्बादी झेली
और बताउंगी, क्ल……
ये ठीक हुआ, की आप इस औघड़ दुनिया की गिरफ्त से
निकल गयी। …क्न्हि पहचान हो तो, लिखे
वरना अंधे कुएं में डालने से कोई मतलब नही। .......
ynha ajkl
आजकल, करपोरेट लेखन के युग में हमें कोई नही पूछने वाला वंहा
अब, लेखन जगत वैसा नही रहा
ये संघर्ष जीवन भर का है
किन्तु, एक लड़की विवाह
और , उसका परिवार उसे सहारा देता है
ये सच है कि मैंने दुःख झेले
किन्तु, मेरा घर ही मेरा आश्रय रहा
मुझे वंही से आर्थिक सहारा रहा
अंत में मई घर -परिवार की सेवा में हूँ
ये मेरा सौभाग्य है
क्यूंकि, बहुत लिखने बाद भी
मई पारिवारिक -किस्म की ही रही
फिर भी, मई इन्ही चाहूंगी
कि , आज की लड़की , लेखन करे भी तो, कोई आर्थिक संबल मिला के करे
writing was always dangerous for me
y, u will ask, y
लिखना हमेशा बहुत मुश्किल था
क्यूंकि, वंहा कोई भी मेरा godfather नही था
फिर भी मई करती रही
क्यूंकि, psc में waiting में फेंक दिए जाने के बाद
अपनी spoiled घरु जिंदगी में , मई बहुत अकेली
बदहवास सी जी रही थी
मायके वालों में कोई पूछता न था
जो कुछ था , अपना लिख कर बयान था
अपने बेटे को कलेजे से लगाये जीना था
लिखती रही
घर से अलग भी हुई
तो, फिरसे घर से मुझे पैसा मिला
मुझे लिखने की अंधी chah चाह ने कभी सर नही उठाने दिया
लिखकर, कागज रंग भर रही थी
दो बार मुंबई गयी
स्टॉक में अंधाधुन्द पैसा गंवाया
सब तरफ से बर्बादी झेली
और बताउंगी, क्ल……
ये ठीक हुआ, की आप इस औघड़ दुनिया की गिरफ्त से
निकल गयी। …क्न्हि पहचान हो तो, लिखे
वरना अंधे कुएं में डालने से कोई मतलब नही। .......
ynha ajkl
आजकल, करपोरेट लेखन के युग में हमें कोई नही पूछने वाला वंहा
अब, लेखन जगत वैसा नही रहा
ये संघर्ष जीवन भर का है
किन्तु, एक लड़की विवाह
और , उसका परिवार उसे सहारा देता है
ये सच है कि मैंने दुःख झेले
किन्तु, मेरा घर ही मेरा आश्रय रहा
मुझे वंही से आर्थिक सहारा रहा
अंत में मई घर -परिवार की सेवा में हूँ
ये मेरा सौभाग्य है
क्यूंकि, बहुत लिखने बाद भी
मई पारिवारिक -किस्म की ही रही
फिर भी, मई इन्ही चाहूंगी
कि , आज की लड़की , लेखन करे भी तो, कोई आर्थिक संबल मिला के करे
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