Sunday, 9 December 2012

Sunday, 11 November 2012

likhna nhi tha asan

आज भी अपनी आठ  पुस्तकें छप जाने के बाद भी मेरे लिए दिन पर दिन नई मुसीबतें है, मई उनसे नही निकल पाऊँगी, जिनके लिए मई लद जाती थी, अब वो मुझसे अलग हो चुके ह, मुझे मेरे बेटे के साथ उस ग्लिज्प्न को सहना है, जिसे सह पाने का मुझे मुझे हमेशा डॉ रहा ह, अपने बेटे के लिए जीना चाहती हु, इतना असं नही होता बिना किसी की पहचान के इस लेखन के निर्मम क्षेत्र में पहचान बना लेना।

Saturday, 13 October 2012

vo khoya hua, bachcha

वो एक  नन्हा  सा बच्चा, जो  आज रात मेरे सपने में आया था, मै  एक  फिल्म  की शुटिंग देख रही थी, जन्हा उस  बच्चे को अकेला  देखती हूँ , तब उसे अपने पास बुला लेती हु, वो दो  बरस  का बच्चा अकेला दीखता है, बहुत सुस्त और उदाश सा , उसे ज्योंही अपनी गोद में लेती हु, वो बहुत खुश होता है।तभी मेरी नींद खुल जाती है, और मुझे याद आता  है, बरसों पहले अपने कोख से एक नन्ही सी जान को दुनिया में आने से पहले ही, उजाड़ देने का , शायद तबसे ही, मुझे उष नन्ही सी जान की याद रहती है ,उसे याद करती हु, वो मेरा बेटा था, सोनू के बाद का, दूसरा बेटा, जिसे मेरी आऐएएस की एक्साम के लिए , उसकी आहुति दी गयी , वो जैसे आज भी अकेला मेरी ममता की प्रतीक्षा करता है 

Friday, 6 January 2012

sidhiyan

जिन्दगी कभी सांप सीढ़ी जैसी  ही तो रही, मै सीढियों पर तेज उतरती चढती  और गिरती पडती रही. हमेशा की जल्दबाज कोई कम होश में नही किया, जैसे सदैव नीम बेहोशी में ही रही हूँ . वः वक्त  नागपुर में मै कानून प्रथम  में थी, और univrsity गिर्ल्स  होस्टल में थी, हमारा होस्टल आज भी  अपने साफ सुथरे माहोल व् अनुशाशन के लिए जाना जाता ह, वंहा की वार्डेन हमारे समय में phd कर  रही थी, परिचित है.
उस वक़्त भी ज्यादा दोस्ती नही थी, उन्ही दिनों मेरे collage  के एक senior शाम को मिलने आये, यूँही , बस मै अपने रूम से निकली तो भागते  हुए  निचे जा रही थी, एक तो शाम का समय ,उस पर उपरी तल से निचे  जाना था, सीडियों के पास था अँधा मोड़, मै भागती हुयी जाकर उपर आ रही senior से टकरा गई,  वो बेचारी सीढ़ी पर गिरते गिरते बची, क्योंकि  मै उस वक्त थोड़ी bhari ही थी, फिर निचे गई तो उसे बताई की, मै इतना तेज आ रही थी की, मै टकरा गई, उसने पूछा ,कौन थी वो, जब नाम बताई तो, उसकी हालत खराब , वो उसकी ही relative  thi . हमने कोई बात न करनी थी, न की.
फिर तो हास्टल में मेरी माधुरी के सामने मुसीबत, उसके सामने से जाते वक़्त , उसकी दबी दबी हंसी का सामना करते गुजरना prikhsa से कम न था, वो अकेली तो होती नही थी, साथ में उसकी सहेली नफीसा भी होती, और दोनों की हंसी का निशाना मै. फिर न मै किसी से मिली, और वो बेचारा कभी आया , तो बाहर से  चले गया.
मै नही मिली कभी किसी से, न  मेरा कभी कोई visitor  रहा , उन सीढियों ने वन्ही सब कुछ रोक दिया.