Sunday, 11 November 2012

likhna nhi tha asan

आज भी अपनी आठ  पुस्तकें छप जाने के बाद भी मेरे लिए दिन पर दिन नई मुसीबतें है, मई उनसे नही निकल पाऊँगी, जिनके लिए मई लद जाती थी, अब वो मुझसे अलग हो चुके ह, मुझे मेरे बेटे के साथ उस ग्लिज्प्न को सहना है, जिसे सह पाने का मुझे मुझे हमेशा डॉ रहा ह, अपने बेटे के लिए जीना चाहती हु, इतना असं नही होता बिना किसी की पहचान के इस लेखन के निर्मम क्षेत्र में पहचान बना लेना।

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