Friday, 6 January 2012

sidhiyan

जिन्दगी कभी सांप सीढ़ी जैसी  ही तो रही, मै सीढियों पर तेज उतरती चढती  और गिरती पडती रही. हमेशा की जल्दबाज कोई कम होश में नही किया, जैसे सदैव नीम बेहोशी में ही रही हूँ . वः वक्त  नागपुर में मै कानून प्रथम  में थी, और univrsity गिर्ल्स  होस्टल में थी, हमारा होस्टल आज भी  अपने साफ सुथरे माहोल व् अनुशाशन के लिए जाना जाता ह, वंहा की वार्डेन हमारे समय में phd कर  रही थी, परिचित है.
उस वक़्त भी ज्यादा दोस्ती नही थी, उन्ही दिनों मेरे collage  के एक senior शाम को मिलने आये, यूँही , बस मै अपने रूम से निकली तो भागते  हुए  निचे जा रही थी, एक तो शाम का समय ,उस पर उपरी तल से निचे  जाना था, सीडियों के पास था अँधा मोड़, मै भागती हुयी जाकर उपर आ रही senior से टकरा गई,  वो बेचारी सीढ़ी पर गिरते गिरते बची, क्योंकि  मै उस वक्त थोड़ी bhari ही थी, फिर निचे गई तो उसे बताई की, मै इतना तेज आ रही थी की, मै टकरा गई, उसने पूछा ,कौन थी वो, जब नाम बताई तो, उसकी हालत खराब , वो उसकी ही relative  thi . हमने कोई बात न करनी थी, न की.
फिर तो हास्टल में मेरी माधुरी के सामने मुसीबत, उसके सामने से जाते वक़्त , उसकी दबी दबी हंसी का सामना करते गुजरना prikhsa से कम न था, वो अकेली तो होती नही थी, साथ में उसकी सहेली नफीसा भी होती, और दोनों की हंसी का निशाना मै. फिर न मै किसी से मिली, और वो बेचारा कभी आया , तो बाहर से  चले गया.
मै नही मिली कभी किसी से, न  मेरा कभी कोई visitor  रहा , उन सीढियों ने वन्ही सब कुछ रोक दिया. 

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