समझा नही था , तब, किन्तु आज सोचती हूँ तो लगता है , नही पता कैसे पहचान हुयी थी, वो मेरी कक्षा के आसपास होता था, जब मई निकलती थी , उसकी तो मोर्निंग सिफत होती , किन्तु, वो हमारी नून सिफ्ट में होता , अपने पुरे ग्रुप के साथ , आज लगता है, कि। …। और लाइब्रेरी में जाओ तो, वो वंहा आ जाता , जाने कैसे उसने बातें शुरू की थी। …… अजीब लगता है , सब कुछ सोच के। थी ज्यादा , बस उसकी और देखना , और वो पास आ जाता। …….
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