Tuesday, 2 July 2013

ye ho kya raha h

वो दरअसल शाम का धुन्दल्का था, और लाइब्रेरी की लाइट ओन  नही की गयी थी , इसे में मेरा भागते आना , और सीनियर का टर्निंग मोड़ पर गिरते गिरते बचना, फिर मै  सॉरी कहकर निचे भागी और वो गयी, लाइब्रेरी से निचे देकी और देखने की,मै  किससे मिलने गयी हूँ . ये देख कर उसकी हंसी नही  की मै उसके ही  के परिचय के रिलेटिव से बात कर रही  हूँ। उसके बाद दो बात हुयी, वो बेचारा कभी होस्टल के भीतर नही आया, बाहर ही,चौक से मिलकर चले जाता, और, अपनी सीनियर का सामना होते ही, मै परेशां हो जाती,जबकि वो अपनी सहेली संग मस्त हंसती निकल जाती . मुझे तब ये नही समझ में नही आता , कि किधर से निकले . 

2 comments:

  1. kl likhti hu, baten itni sahaj nhi hoti, jitni hm soch lete h

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  2. vo vqt bhi itna sidha nhi tha, jitna lgta h

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