Monday, 1 July 2013

सीढिया दरअसल, ये मेरी होस्टल की याद  से उपजा शीर्षक है. जब मै नागपुर में थी , युनिवेर्सिटी के गर्ल्स होस्टल में , लॉ का पहला साल , मई बहुत मन लगाकर ही स्टडी करती थी . शरारती उतनी नही थी , जितनी जल्दबाज , जो की आज भी हूँ .उस शाम मै अपने रूम में ही थी, बहादुर ने तभी नीचे गार्डन से मेरा नाम लेकर पुकारा था . मै फर्स्ट फ्लोर पर थी, सो पता था, की वन्ही मुझसे मिलने आया है, उसने कहा था, की वो आयेगा . बस  इतनी सी  ही बात थी . शानझ का धुन्दल्का  था , मुझे तेज भागते हुए सीधी से निचे जाना, और जन्हा से सीढ़ी शुरू होती थी, वन्ही से मोड़ भी था . तो, मई एकदम से टकरा गयी थी , उपर आती सिनिएर से, वो तो उसकी सहेली ने उसे संभाली, वरना वो निचे गिरती चले जाती . मुसीबत ये हुयी की जो मिलने आया था, वो उसी का रिलेटिव था , क्यूंकि 

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