ये नही मालूम , की उससे पहचान क्यूँकर हुयी , या हो गयी , कोई भी हमारे बीच परिचित नही था, न मेरे हाथों से किताबें ही फिसली थी .वो, तो बस मै अपनी क्लास से बहार निकलती थी , तब वो लाइब्रेरी साइड में खड़ा होता थ. सिर्फ इतना ही था, ऐसा भी न्हि. किन्तु मेरा ध्यान उसकी और बार बार जाता था, की वो हमारी क्लासिकल collage बिल्डिंग में, एक मेहराब के निचे खड़ा दीखता, तो बहुत ही , अच्छा लगा होगा . फिर, मेरी पहली क्लास होती, और वो सर्किल गार्डन में सामने ही होता , काफी वक्त तक, तब तक नजरें उधर ही होती, यंहा तक की, attandance मिस हो जाती, अपराजित सर फिर भी लगा देते ,
bahut jldi me likh rahi hu
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