समझा नही था , तब, किन्तु आज सोचती हूँ तो लगता है , नही पता कैसे पहचान हुयी थी, वो मेरी कक्षा के आसपास होता था, जब मई निकलती थी , उसकी तो मोर्निंग सिफत होती , किन्तु, वो हमारी नून सिफ्ट में होता , अपने पुरे ग्रुप के साथ , आज लगता है, कि। …। और लाइब्रेरी में जाओ तो, वो वंहा आ जाता , जाने कैसे उसने बातें शुरू की थी। …… अजीब लगता है , सब कुछ सोच के। थी ज्यादा , बस उसकी और देखना , और वो पास आ जाता। …….
Saturday, 31 August 2013
sidhiya
होने के बाद मिला था , उसे जब बताई थी, तो अपने बेटे के बारे में बोलती रही, और वो बिलकुल चुप रहा , फिर हम चले गये , के लिए , शादी के बाद, बेटे होने के बाद भी मुझे बहुत तरस देते थे , वो अलग कहानी है , जिसे अब कहने का कोई नही , किन्तु मेरी शाररिक व् मानसिक हालत बदतर हो चली थी , संभलने में आज भी जद्दोजहद चल रही है
kya likhu
use नही देख कर बहुत बेचैनी होती थी , उसकी मुस्कराहट उतनी ही, बाल-सुलभ शिशु जैसी लगती, जैसी आज सोनू मुस्कराता है,वैसा ही, गंभीर व् संस्कारी , कंही भी उसके व्यवहार में छिछलापन नही था। वो अक्सर देख मेरे पास आ जाता , जब मेरी क्लास झुट्टी थी , वो दोपहर अपने होस्टल से आता , ज्ब्मेरी बस आने वाली होती, वो सडक के दुसरे छोर पर होता , मुस्कराता हुवा। एक बार मेरे पास आकर बोल, कल धरम्पेथ में लव स्क़ुएर पर मिलते है , शाम किन्तु मई वंहा गयी, अपने यंगर brother के साथ , वो वन्ही चौक पर खड़ा मुझे छिप कर देखता रहा , उसे नही पता था, की वो मै अपने छोटे भाई के साथआ ई हूँ , मेरा भाई काफी ऊँचा पूरा , मुझसे बड़ा ही लगा होगा उसे , मई उसे देखती रही , की वो मिले तो, मै बताओं की , मै भाई के साथ गाँव जा रही हूँ, जब गाँव से लौटी तो, वो बहुत सामने नही दिखा , शायद उसे लगा, मई इसे ही झूठ बोलती हु, किन्तु सच तो ये था, की मेरी एकमात्र उससे इसी पहचान हुयी थी, जन्हा हमने कभी कोई बात ही नही की थी। उसके बाद उसका सामने आना व् दिखना बंद हो गया था, मई भी अपनी स्टडी में लग गयी थी, इंग्लिश मध्यम में जो लॉ मै याद करती , उसमे बस रट लेती थी , वारंट व् बेल का व्यवहारिक मतलब न तब जनि न अब ,मै अंग्रेजी में जो पद्धति,उसे वैसा ही बिना समझे भी लिख लेती थी।
बाद में हमारी गेदरिंग के वक्त रात ८. ३० बजे में अपनी सहेलियों संग कॉलेज जाते समय जब रिक्शे से जा रही थी, तब मै में थी , उधर सामने से एक बाइक में इतनी तेजी से दो लडके निकले की, कुछ समझती, इसके पहले, एक लडके ने , मुझपर हाथ मार दिया , ये attak इतना तेज व् अकस्मात था, की मै एकदम से बदहवास सी हो गयी, सबसे ज्यादा शर्म मुझे अपनी सहेलियों के सामने आई थी , क्योंकि, वो दोनों सेफ थी, हमला मुझे झेलना पड़ा था, मेरी शर्म का ठिकाना नही था, मै उनकी और देख नही प् रही थी, न ही आजतक वो वाकया मैंने किसी से कहा। हम जब कॉलेज पंहुचे तो, वन्ही सामने था, उसे देख मुझे हिम्मत मिली। मैंने उससे भी कुछ नही कही, किन्तु हमारी उसके बाद आमने सामने आने की मुलाकात होती, वन्ही कभी कुछ न बोले , देखने भर की, वो उसी तरह , से मुझे बस स्टॉप पर दिखता। कभी होस्टल आता , तो चौक पर ही बातें होती , मई उसकी बातों के अर्थ कभी नही समझी , यदि वो कहता, मुझे मध्य प्रदेश बहुत पसंद है , भोपाल अच्चा लगता है, वंहा बहुत पहाड़ है , वगेरह , मई उसे याद दिलाती की, मै भोपाल नही , बालाघाट से हु, वो कहता , हाँ वन्ही की बात कह रहा था । किन्तु न मई समझती, न उसने ज्यादा कभी कोई बात की।
वो एक्साम्स के दिन थे , मै दोपहर में अकेले बस की रह देख रही थी , वो जाने किसका स्कूटर उठा लाया , कहने लगा , चलो , तुम्हे मै होस्टल पंहुचा देता।नही क़ह्ते हुए मै उसके साथ होस्टल तक गयी , किन्तु मैंने उससे पहले ही चौक तक उतार देने को कही , क्योंकि हमारी सीनियेर उसकी रिलेटिव थी , और वो बहुत हंसती ,उसने लौटते वक्त कहा , अगले साल आना.…। कुछ एस ही उसने कहा था , फिर परीक्षाएं हो गयी , और मेरी परीक्षा के पहले जमी सगाई। ंऐने मना की, किन्तु मेरे भाग्य में जो था, वन्ही हुवा। सोनू की मुस्कराहट देखकर उसकी याद अब आई है मैंने फिर विवाह बाद दो साल वन्ही से लॉ पूरा की, किन्तु उसने मुझे सेकंड ईयर में बस एकबार कांग्रेट्स कहा , और कभी सामने भी नही आया , वैसे भी वो हमारा सीनियर था, मेरे फाइनल तक लॉ पूरा क्र चूका था
किन्तु, मै उसे याद कर अक्सर उदाश होती थी , वक्त इतना गुजर गया है , किन्तु लेदेके वन्ही एकमात्र मेरा मित्र रहा , जिसे समझ नही सकी की मित्रता कहूँ, या नही , हाँ सोनू की गंभीर मुस्कराहट व् संजीदा सवभाव में मुझे उसकी आदत झलकती है।
बाद में हमारी गेदरिंग के वक्त रात ८. ३० बजे में अपनी सहेलियों संग कॉलेज जाते समय जब रिक्शे से जा रही थी, तब मै में थी , उधर सामने से एक बाइक में इतनी तेजी से दो लडके निकले की, कुछ समझती, इसके पहले, एक लडके ने , मुझपर हाथ मार दिया , ये attak इतना तेज व् अकस्मात था, की मै एकदम से बदहवास सी हो गयी, सबसे ज्यादा शर्म मुझे अपनी सहेलियों के सामने आई थी , क्योंकि, वो दोनों सेफ थी, हमला मुझे झेलना पड़ा था, मेरी शर्म का ठिकाना नही था, मै उनकी और देख नही प् रही थी, न ही आजतक वो वाकया मैंने किसी से कहा। हम जब कॉलेज पंहुचे तो, वन्ही सामने था, उसे देख मुझे हिम्मत मिली। मैंने उससे भी कुछ नही कही, किन्तु हमारी उसके बाद आमने सामने आने की मुलाकात होती, वन्ही कभी कुछ न बोले , देखने भर की, वो उसी तरह , से मुझे बस स्टॉप पर दिखता। कभी होस्टल आता , तो चौक पर ही बातें होती , मई उसकी बातों के अर्थ कभी नही समझी , यदि वो कहता, मुझे मध्य प्रदेश बहुत पसंद है , भोपाल अच्चा लगता है, वंहा बहुत पहाड़ है , वगेरह , मई उसे याद दिलाती की, मै भोपाल नही , बालाघाट से हु, वो कहता , हाँ वन्ही की बात कह रहा था । किन्तु न मई समझती, न उसने ज्यादा कभी कोई बात की।
वो एक्साम्स के दिन थे , मै दोपहर में अकेले बस की रह देख रही थी , वो जाने किसका स्कूटर उठा लाया , कहने लगा , चलो , तुम्हे मै होस्टल पंहुचा देता।नही क़ह्ते हुए मै उसके साथ होस्टल तक गयी , किन्तु मैंने उससे पहले ही चौक तक उतार देने को कही , क्योंकि हमारी सीनियेर उसकी रिलेटिव थी , और वो बहुत हंसती ,उसने लौटते वक्त कहा , अगले साल आना.…। कुछ एस ही उसने कहा था , फिर परीक्षाएं हो गयी , और मेरी परीक्षा के पहले जमी सगाई। ंऐने मना की, किन्तु मेरे भाग्य में जो था, वन्ही हुवा। सोनू की मुस्कराहट देखकर उसकी याद अब आई है मैंने फिर विवाह बाद दो साल वन्ही से लॉ पूरा की, किन्तु उसने मुझे सेकंड ईयर में बस एकबार कांग्रेट्स कहा , और कभी सामने भी नही आया , वैसे भी वो हमारा सीनियर था, मेरे फाइनल तक लॉ पूरा क्र चूका था
किन्तु, मै उसे याद कर अक्सर उदाश होती थी , वक्त इतना गुजर गया है , किन्तु लेदेके वन्ही एकमात्र मेरा मित्र रहा , जिसे समझ नही सकी की मित्रता कहूँ, या नही , हाँ सोनू की गंभीर मुस्कराहट व् संजीदा सवभाव में मुझे उसकी आदत झलकती है।
Sunday, 4 August 2013
dost milte h, bichhdte h
जिन्दगी के हर मोड़ पर, दोस्त मिलते है
बिछड़ते है , दिल उन्हें याद करता है
किन्तु सभी तो हरवक्त ,हर लम्हा साथ नही
होते। उनकी यादें हमे रह दिखाती है
उनकी जिंदगी होती है, यदि वो अपनी जिंदगी में खुश हो,
तो हम भी खुश होते है
कितने है जो, साथ चलते बहुत दूर हो गये
कितने है, जो अब शायद न मिले
किन्तु, उन्हें यद् करने का सुख तुम अपने आप से
कभी मत छिनना
बिछड़ते है , दिल उन्हें याद करता है
किन्तु सभी तो हरवक्त ,हर लम्हा साथ नही
होते। उनकी यादें हमे रह दिखाती है
उनकी जिंदगी होती है, यदि वो अपनी जिंदगी में खुश हो,
तो हम भी खुश होते है
कितने है जो, साथ चलते बहुत दूर हो गये
कितने है, जो अब शायद न मिले
किन्तु, उन्हें यद् करने का सुख तुम अपने आप से
कभी मत छिनना
vo, purana ngma
बहुत पुराना गीत है
अपने भी सुने होंगे
कल कल करते ,कितने
सावन बीत गये
जाने कब इन आँखों का
शर्माना जायेगा
अपने भी सुने होंगे
कल कल करते ,कितने
सावन बीत गये
जाने कब इन आँखों का
शर्माना जायेगा
Friday, 2 August 2013
sidhiyan
एक computor repair करने वाला लगातार watch कर रहा
कोम्पुटर पर लिखना वैसे ही होता है, जैसे सबके सामने चौराहे पर खड़े रहना
वो, मेरे पास आकर देखने लगा , की क्या कर रही हूँ
मुझे ठीक नही लगा , लगता है मई एक पिछड़े कश्बे में हूँ
सोनू के वक्त, ७ थ माह में , जिस तरह से सीढियों से तेजी से चलती थी , मेरी सहेलियां तब मुझे डांटती थी
कोम्पुटर पर लिखना वैसे ही होता है, जैसे सबके सामने चौराहे पर खड़े रहना
वो, मेरे पास आकर देखने लगा , की क्या कर रही हूँ
मुझे ठीक नही लगा , लगता है मई एक पिछड़े कश्बे में हूँ
सोनू के वक्त, ७ थ माह में , जिस तरह से सीढियों से तेजी से चलती थी , मेरी सहेलियां तब मुझे डांटती थी
vo ajib daur tha
वो वक्त भी अजीब था , हर समय मन सपनों के पंख लगाये उड़ता फिरता था। वैसे ही चलने की आदत थी , भागते हुए किसी अवसर पर , सीढ़ी के मोड़ पर टकरा जाना , शायद सभी के साथ एस होता है। बहुत शोर होने से नही लिख सकती मै
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