सीढियों की बातें, फिर कभी , आज तो गीतों के अनुवाद देखूंगी
Thursday, 4 July 2013
Wednesday, 3 July 2013
vo, ajib si mulakat
ये नही मालूम , की उससे पहचान क्यूँकर हुयी , या हो गयी , कोई भी हमारे बीच परिचित नही था, न मेरे हाथों से किताबें ही फिसली थी .वो, तो बस मै अपनी क्लास से बहार निकलती थी , तब वो लाइब्रेरी साइड में खड़ा होता थ. सिर्फ इतना ही था, ऐसा भी न्हि. किन्तु मेरा ध्यान उसकी और बार बार जाता था, की वो हमारी क्लासिकल collage बिल्डिंग में, एक मेहराब के निचे खड़ा दीखता, तो बहुत ही , अच्छा लगा होगा . फिर, मेरी पहली क्लास होती, और वो सर्किल गार्डन में सामने ही होता , काफी वक्त तक, तब तक नजरें उधर ही होती, यंहा तक की, attandance मिस हो जाती, अपराजित सर फिर भी लगा देते ,
Tuesday, 2 July 2013
ye ho kya raha h
वो दरअसल शाम का धुन्दल्का था, और लाइब्रेरी की लाइट ओन नही की गयी थी , इसे में मेरा भागते आना , और सीनियर का टर्निंग मोड़ पर गिरते गिरते बचना, फिर मै सॉरी कहकर निचे भागी और वो गयी, लाइब्रेरी से निचे देकी और देखने की,मै किससे मिलने गयी हूँ . ये देख कर उसकी हंसी नही की मै उसके ही के परिचय के रिलेटिव से बात कर रही हूँ। उसके बाद दो बात हुयी, वो बेचारा कभी होस्टल के भीतर नही आया, बाहर ही,चौक से मिलकर चले जाता, और, अपनी सीनियर का सामना होते ही, मै परेशां हो जाती,जबकि वो अपनी सहेली संग मस्त हंसती निकल जाती . मुझे तब ये नही समझ में नही आता , कि किधर से निकले .
sidhiya
क्या लिखू तो ,कितना परेशां हो जाती हूँ , सारी बातें इतनी सीधी नही होती , जितनी की सीढियाँ , इशलिये फिर कभी लिखूंगी
Monday, 1 July 2013
सीढिया दरअसल, ये मेरी होस्टल की याद से उपजा शीर्षक है. जब मै नागपुर में थी , युनिवेर्सिटी के गर्ल्स होस्टल में , लॉ का पहला साल , मई बहुत मन लगाकर ही स्टडी करती थी . शरारती उतनी नही थी , जितनी जल्दबाज , जो की आज भी हूँ .उस शाम मै अपने रूम में ही थी, बहादुर ने तभी नीचे गार्डन से मेरा नाम लेकर पुकारा था . मै फर्स्ट फ्लोर पर थी, सो पता था, की वन्ही मुझसे मिलने आया है, उसने कहा था, की वो आयेगा . बस इतनी सी ही बात थी . शानझ का धुन्दल्का था , मुझे तेज भागते हुए सीधी से निचे जाना, और जन्हा से सीढ़ी शुरू होती थी, वन्ही से मोड़ भी था . तो, मई एकदम से टकरा गयी थी , उपर आती सिनिएर से, वो तो उसकी सहेली ने उसे संभाली, वरना वो निचे गिरती चले जाती . मुसीबत ये हुयी की जो मिलने आया था, वो उसी का रिलेटिव था , क्यूंकि
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