Saturday, 15 June 2013

वो सांप सीढियों के खेल
वो लहलहाती बेल
वो, बावली के जल में
थरथराता चन्द्रमा
वो सीढियों से झांकता तिलिस्म
वो हरी हुयी बाजी
शतरंज के खेल सी
पांसे चलती , ये जिन्दगी
                                    जोगेश्वरी 

Tuesday, 11 June 2013

लिखने       की  शक्ति खो चुकी  हु    , किन्तु लिखू  तो , और क्या करू , मुझे लिखने के सिवाय क्या अत है .

Sunday, 9 June 2013

चापलूसी-तन्त्र से महल भले ही खड़े कर  लो , किन्तु साहित्य ,सभ्यता व् संस्कृति का विकास नही हो सकता .यंहा लिखने से ज्यादा छपने के लिए लुटाना पड़ता है .
चापलूसी की चासनी से लेखन नही किया जाता
ये बहुत जमीनी होता है , उनके बीच से निकलता है
जो , धूप में पैदल चलते है
dringroom  का लेखन सतही होता है